. *" मैंने दहेज़ नहीं माँगा "*
साहब मैं थाने नहीं आउंगा,
अपने इस घर से कहीं नहीं जाउंगा,
माना पत्नी से थोडा मन मुटाव था,
सोच में अन्तर और विचारों में खिंचाव था,
*पर यकीन मानिए साहब ,*
*" मैंने दहेज़ नहीं माँगा "*
मानता हूँ कानून आज पत्नी के पास है,
महिलाओं का समाज में हो रहा विकास है।
चाहत मेरी भी बस ये थी कि माँ बाप का सम्मान हो,
उन्हें भी समझे माता पिता, न कभी उनका अपमान हो।
पर अब क्या फायदा, जब टूट ही गया हर रिश्ते का धागा,
*यकीन मानिए साहब,*
*" मैंने दहेज़ नहीं माँगा "*
परिवार के साथ रहना इसे पसंन्द नहीं,
कहती यहाँ कोई रस, कोई आनन्द नही,
मुझे ले चलो इस घर से दूर, किसी किराए के आशियाने में,
कुछ नहीं रखा माँ बाप पर प्यार बरसाने में,
हाँ छोड़ दो, छोड़ दो इस माँ बाप के प्यार को,
नहीं मांने तो याद रखोगे मेरी मार को,
बस बूढ़े माता पिता का ही मोह, न छोड़ पाया मैं अभागा,
*यकींन मानिए साहब,*
*" मैंने दहेज़ नहीं माँगा "*
फिर शुरू हुआ वाद विवाद माँ बाप से अलग होने का,
शायद समय आ गया था, चैन और सुकून खोने का,
एक दिन साफ़ मैंने पत्नी को मना कर दिया,
न रहुगा माँ बाप के बिना ये उसके दिमाग में भर दिया।
बस मुझसे लड़ कर मोहतरमा मायके जा पहुंची,
2 दिन बाद ही पत्नी के घर से मुझे धमकी आ पहुंची,
माँ बाप से हो जा अलग, नहीं सबक सीखा देगे,
क्या होता है दहेज़ कानून तुझे इसका असर दिखा देगें।
परिणाम जानते हुए भी हर धमकी को गले में टांगा,
*यकींन माँनिये साहब ,*
*" मैंने दहेज़ नहीं माँगा "*
जो कहा था बीवी ने, आखिरकार वो कर दिखाया,
झगड़ा किसी और बात पर था, पर उसने दहेज़ का नाटक रचाया।
बस पुलिस थाने से एक दिन मुझे फ़ोन आया,
क्यों बे, पत्नी से दहेज़ मांगता है, ये कह के मुझे धमकाया।
माता पिता भाई बहिन जीजा सभी के रिपोर्ट में नाम थे,
घर में सब हैरान, सब परेशान थे,
अब अकेले बैठ कर सोचता हूँ, वो क्यों ज़िन्दगी में आई थी,
मैंने भी तो उसके प्रति हर ज़िम्मेदारी निभाई थी।
आखिरकार तमका मिला हमे दहेज़ लोभी होने का,
कोई फायदा न हुआ मीठे मीठे सपने सजोने का।
बुलाने पर थाने आया हूँ, छूप कर कहीं नहीं भागा,
*लेकिन यकींन मानिए साहब ,*
*" मैंने दहेज़ नहीं माँगा "*
😪 *झूठे दहेज के मुकदमों के कारण ,*
*पुरुष के दर्द से ओतप्रोत एक मार्मिक कृति…* 🙏🏻
*दहेज की ये कविता कई घरो की हकीकत है*
Wednesday, May 11, 2016
Monday, May 9, 2016
शिवपुराण
💐🌷संक्षिप्त श्री शिवपुराण के महात्म्य, विद्येश्वर संहिता, रूद्र संहिता सृष्टि (प्रथम) खंड, रूद्र संहिता सती (द्वितीय) खंड के अध्याय 27 तक के आडियो सुनने या डाउनलोड करने के लिए इस लिंक https://drive.google.com/folderview?id=0Bydidp9EcsYDdVlGaGY0VGo2MXc
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माँ बहुत झूठ बोलती है.....
.......माँ बहुत झूठ बोलती है.......
सुबह जल्दी जगाने को,
सात बजे को आठ कहती है।
नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है।
मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़ती है।
छोटी छोटी परेशानियों पर बड़ा बवंडर करती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
थाल भर खिलाकर,
तेरी भूख मर गयी कहती है।
जो मैं न रहूँ घर पे तो,
मेरी पसंद की कोई चीज़ रसोई में उससे नहीं पकती है।
मेरे मोटापे को भी,
कमजोरी की सूजन बोलती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
दो ही रोटी रखी है रास्ते के लिए, बोल कर,
मेरे साथ दस लोगों का खाना रख देती है।
कुछ नहीं-कुछ नहीं बोल,
नजर बचा बैग में,
छिपी शीशी अचार की बाद में निकलती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
टोका टाकी से जो मैं झुँझला जाऊँ कभी तो,
समझदार हो, अब न कुछ बोलूँगी मैं,
ऐंसा अक्सर बोलकर वो रूठती है।
अगले ही पल फिर चिंता में हिदायती हो जाती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
तीन घंटे मैं थियटर में ना बैठ पाऊँगी,
सारी फ़िल्में तो टी वी पे आ जाती हैं,
बाहर का तेल मसाला तबियत खराब करता है,
बहानों से अपने पर होने वाले खर्च टालती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
मेरी उपलब्धियों को बढ़ा चढ़ा कर बताती है।
सारी खामियों को सब से छिपा लिया करती है।
उसके व्रत, नारियल, धागे, फेरे, सब मेरे नाम,
तारीफ़ ज़माने में कर बहुत शर्मिंदा करती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
भूल भी जाऊँ दुनिया भर के कामों में उलझ,
उसकी दुनिया में वो मुझे कब भूलती है।
मुझ सा सुंदर उसे दुनिया में ना कोई दिखे,
मेरी चिंता में अपने सुख भी किनारे कर देती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
उसके फैलाए सामानों में से जो एक उठा लूँ
खुश होती जैसे, खुद पर उपकार समझती है।
मेरी छोटी सी नाकामयाबी पे उदास होकर,
सोच सोच अपनी तबियत खराब करती है।
......माँ बहुत झूठ बेलती है........
सुबह जल्दी जगाने को,
सात बजे को आठ कहती है।
नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है।
मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़ती है।
छोटी छोटी परेशानियों पर बड़ा बवंडर करती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
थाल भर खिलाकर,
तेरी भूख मर गयी कहती है।
जो मैं न रहूँ घर पे तो,
मेरी पसंद की कोई चीज़ रसोई में उससे नहीं पकती है।
मेरे मोटापे को भी,
कमजोरी की सूजन बोलती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
दो ही रोटी रखी है रास्ते के लिए, बोल कर,
मेरे साथ दस लोगों का खाना रख देती है।
कुछ नहीं-कुछ नहीं बोल,
नजर बचा बैग में,
छिपी शीशी अचार की बाद में निकलती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
टोका टाकी से जो मैं झुँझला जाऊँ कभी तो,
समझदार हो, अब न कुछ बोलूँगी मैं,
ऐंसा अक्सर बोलकर वो रूठती है।
अगले ही पल फिर चिंता में हिदायती हो जाती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
तीन घंटे मैं थियटर में ना बैठ पाऊँगी,
सारी फ़िल्में तो टी वी पे आ जाती हैं,
बाहर का तेल मसाला तबियत खराब करता है,
बहानों से अपने पर होने वाले खर्च टालती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
मेरी उपलब्धियों को बढ़ा चढ़ा कर बताती है।
सारी खामियों को सब से छिपा लिया करती है।
उसके व्रत, नारियल, धागे, फेरे, सब मेरे नाम,
तारीफ़ ज़माने में कर बहुत शर्मिंदा करती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
भूल भी जाऊँ दुनिया भर के कामों में उलझ,
उसकी दुनिया में वो मुझे कब भूलती है।
मुझ सा सुंदर उसे दुनिया में ना कोई दिखे,
मेरी चिंता में अपने सुख भी किनारे कर देती है।
......माँ बहुत झूठ बोलती है......
उसके फैलाए सामानों में से जो एक उठा लूँ
खुश होती जैसे, खुद पर उपकार समझती है।
मेरी छोटी सी नाकामयाबी पे उदास होकर,
सोच सोच अपनी तबियत खराब करती है।
......माँ बहुत झूठ बेलती है........
अक्षय तृतीया
अक्षय तृतीया जो इस वर्ष 9May को है उसका महत्व क्यों है जानिए कुछ महत्वपुर्ण जानकारी
-🙏 आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था ।
🙏-महर्षी परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था ।
🙏-माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था
🙏-द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था ।
🙏- कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था ।
🙏- कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था ।
🙏-सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था ।
🙏-ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था ।
🙏- प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है ।
🙏- बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है अन्यथा साल भर वो बस्त्र से ढके रहते है ।
🙏- इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था ।
🙏- अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है
-🙏 आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था ।
🙏-महर्षी परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था ।
🙏-माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था
🙏-द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था ।
🙏- कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था ।
🙏- कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था ।
🙏-सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था ।
🙏-ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था ।
🙏- प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है ।
🙏- बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है अन्यथा साल भर वो बस्त्र से ढके रहते है ।
🙏- इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था ।
🙏- अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है
मैं परशुराम बोल रहा हूँ...
मैं परशुराम बोल रहा हूँ...
================
मैं, तुम्हारा पूर्वज,
परशुराम बोल रहा हूँ...
अपने जीवन के कुछ,
रहस्य खोल रहा हूँ ..../१/
माँ रेणुका, पिता जमदग्नि
ये सब जानते हैं
विष्णु का छठा अवतार
मुझे सब मानते हैं .../२/
मैं भृगु वंश में जन्मा
पितामह त्रिकालदर्शी थे
भृगुसंहिता के प्रणेता
दिव्यदृष्टि वाले महर्षि थे,,/३/
पांच भाइयों में सबसे छोटा
घर भर का दुलारा था
माँ- बाप ने 'राम' कहा
जग ने परशुराम पुकारा था.../४/
मेरे आगमन का ध्येय विशेष
मैं विष्णु का आवेशावतार था
मिथ्या दंभ से धरा तप्त थी
मेरा कर्म उद्दंडियों का संहार था.../५/
नानी के छल के कारण
मैं ब्राह्मण कुल में जन्मा था
ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियत्व
मेरी रगों में पनपा था.../६/
परम विदुषी माँ रेणुका ने
सर्वप्रथम मुझे ज्ञान दिया था
आज्ञापालन और प्रकृति प्रेम का
बेशकीमती संज्ञान दिया था../७/
विश्वामित्र मेरे परम गुरु
ऋचीक आश्रम विद्यास्थली रहा
शिव ने सिखाया रण मुझे
इसीलिए तो मैं महाबली रहा../८/
महामनाओं की कृपा मुझ पर
अनंत और अनवरत रही
दिव्य शस्त्र और दिव्य मंत्र मिले
तन पर अभेद परत रही.../९/
विद्युदभि नामक विशाल फरसा
श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच,
शिव गुरु ने प्रदान किया था
स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु
के साथ साथ महादेव ने मुझे
सहृदयता से विद्यादान दिया था../१०/
चक्रतीर्थ में मेरे कठिन तप ने
विष्णु को प्रसन्न कर दिया था
उन्होंने मुझे कल्पान्त पर्यन्त
भूलोक पर रहने का वर दिया../११/
क्षणिक कमजोरी के वशीभूत
माँ ने एक पाप किया था
परपुरुष पर मोहित होने का
पिता ने बहुत संताप किया था../१२/
पितृ आदेश से मैंने फिर
माँ-भ्राताओं का वध कर डाला
आज्ञा पालन से अभिभूत पिता ने
मुझे स्नेहिल बाहों में भर डाला../१३/
कोमल हृदय पिता ने मुझे
बहुमूल्य वरदान दिया था
मेरी याचना पर माँ-भ्राताओं को
फिर से जीवन दान दिया था.../१४/
हैहय वंशाधिपति कार्त्तवीर्यअर्जुन
सहस्त्रार्जुन कहलाया था
दत्तात्रेय को तप से प्रसन्न कर
हजार बाहुओं का वर पाया था.../१५/
बड़ी शक्ति ने सहस्त्रार्जुन को
स्वेच्छाचारी बना दिया था
उसने वो हर काम किया
जिसके लिए उसे मना किया था .../१६/
सहस्त्रार्जुन के आश्रम प्रवास पर
पूज्य पिता ने उपकार किया था
सैन्यबल सहित राजा का
भरपूर अतिथि सत्कार किया था ../१७/
कामधेनु कपिला के प्रताप से
धनधान्य भरपूर था
आश्रम का वैभव देखकर
राजा का दर्प चकनाचूर था .../१८/
कपिला को हड़प जाने को
सहस्त्रार्जुन ललचाया था
चोरी जैसे नीच कर्म पर
'प्रजापालक' उतर आया था .../१९/
इस बलात हरण का तब मैंने
पुरजोर प्रतिकार किया था
फरसे से हजार भुजाएं काट डाली
लुटेरे का संहार किया था ---/२०/
मेरी अनुपस्थिति में राजपुत्रों ने
ध्यानस्थ पिता की हत्या कर दी
इस कायरतापूर्ण कुकर्म ने मन में
ऐसे क्षत्रियों के प्रति जुगुप्सा भर दी .../२१/
माँ रेणुका सती हो गईं
पल में मैंने माँ- बाप खो दिए थे
इस अपूरणीय क्षति ने
भावी हाहाकार के बीज बो दिए थे ../२२/
मेरे जीवन का एकमेव ध्येय
मातृभूमि का उपचार करना था
फरसे के प्रहार से पापियों का
पापयुक्त दूषित जीवन हरना था.../२३/
इक्कीस बार भू को मैंने
पापीयों से विमुक्त किया था
जगत वन्दनीय धरा को
आततायी रक्त से सिक्त किया था ../२४/
अहा!! कैसा रक्तिम समय वह
कितना प्रचंड दौर था
दसों दिशाओं में त्राहि त्राहि का
खूब मर्मान्तक शोर था .../२५/
पांच सरोवर दूषित रक्त से
मैंने सराबोर किये थे
सहस्त्रार्जुन सुतों के रक्त से
पिता के श्राद्ध घनघोर किये थे .../२६/
अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण कर
अपनी शक्ति का जग को भान दिया
सप्तद्वीप युक्त भूमंडल
फिर महर्षि कश्यप को दान दिया .../२७/
महर्षि ऋचीक प्रकट हुए
उन्होंने मुझे शांत किया था
शस्त्र त्याग कर फिर मैंने
महेंद्र पर्वत पर विश्राम किया था .../२८/
मुझसे शस्त्र विद्या सीखने
कईं विभूतियाँ आती रहीं
भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसी हस्तियाँ
मुझसे ज्ञान पाती रहीं .../२९/
पशु-पक्षियों का और मेरा
आपस में बहुत प्यार था
उनके संग संततियों सा मेरा
प्रेमपूर्ण भावुक व्यवहार था .../३०/
काव्य से प्रेम था मुझे मैं,
शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र का रचनाकार रहा
मेरे द्वारा रचित परशुराम गायत्री
इच्छित फल पाने का अचूक आधार रहा.../३१/
स्त्री स्वातंत्र्य का पक्षधर मैं
मैंने बहु पत्नी विवाह पर आघात किया
अनसूया लोपामुद्रा के सहयोग से
नारी-जागृति-अभियान का सूत्रपात किया .../३२/
आज अक्षय तृतीया है
तुम मेरा जन्मदिन मनाओगे
मेरी जीवन गाथा
तुम सभी को सुनाओगे..../३३/
मेरा आशीष है तुमको
ज्ञानवान बनो विद्यादान करो
सुसुप्त पड़ी हैं शक्तियां
अपनी क्षमता की पहचान करो ..
जय परशुराम
================
मैं, तुम्हारा पूर्वज,
परशुराम बोल रहा हूँ...
अपने जीवन के कुछ,
रहस्य खोल रहा हूँ ..../१/
माँ रेणुका, पिता जमदग्नि
ये सब जानते हैं
विष्णु का छठा अवतार
मुझे सब मानते हैं .../२/
मैं भृगु वंश में जन्मा
पितामह त्रिकालदर्शी थे
भृगुसंहिता के प्रणेता
दिव्यदृष्टि वाले महर्षि थे,,/३/
पांच भाइयों में सबसे छोटा
घर भर का दुलारा था
माँ- बाप ने 'राम' कहा
जग ने परशुराम पुकारा था.../४/
मेरे आगमन का ध्येय विशेष
मैं विष्णु का आवेशावतार था
मिथ्या दंभ से धरा तप्त थी
मेरा कर्म उद्दंडियों का संहार था.../५/
नानी के छल के कारण
मैं ब्राह्मण कुल में जन्मा था
ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियत्व
मेरी रगों में पनपा था.../६/
परम विदुषी माँ रेणुका ने
सर्वप्रथम मुझे ज्ञान दिया था
आज्ञापालन और प्रकृति प्रेम का
बेशकीमती संज्ञान दिया था../७/
विश्वामित्र मेरे परम गुरु
ऋचीक आश्रम विद्यास्थली रहा
शिव ने सिखाया रण मुझे
इसीलिए तो मैं महाबली रहा../८/
महामनाओं की कृपा मुझ पर
अनंत और अनवरत रही
दिव्य शस्त्र और दिव्य मंत्र मिले
तन पर अभेद परत रही.../९/
विद्युदभि नामक विशाल फरसा
श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच,
शिव गुरु ने प्रदान किया था
स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु
के साथ साथ महादेव ने मुझे
सहृदयता से विद्यादान दिया था../१०/
चक्रतीर्थ में मेरे कठिन तप ने
विष्णु को प्रसन्न कर दिया था
उन्होंने मुझे कल्पान्त पर्यन्त
भूलोक पर रहने का वर दिया../११/
क्षणिक कमजोरी के वशीभूत
माँ ने एक पाप किया था
परपुरुष पर मोहित होने का
पिता ने बहुत संताप किया था../१२/
पितृ आदेश से मैंने फिर
माँ-भ्राताओं का वध कर डाला
आज्ञा पालन से अभिभूत पिता ने
मुझे स्नेहिल बाहों में भर डाला../१३/
कोमल हृदय पिता ने मुझे
बहुमूल्य वरदान दिया था
मेरी याचना पर माँ-भ्राताओं को
फिर से जीवन दान दिया था.../१४/
हैहय वंशाधिपति कार्त्तवीर्यअर्जुन
सहस्त्रार्जुन कहलाया था
दत्तात्रेय को तप से प्रसन्न कर
हजार बाहुओं का वर पाया था.../१५/
बड़ी शक्ति ने सहस्त्रार्जुन को
स्वेच्छाचारी बना दिया था
उसने वो हर काम किया
जिसके लिए उसे मना किया था .../१६/
सहस्त्रार्जुन के आश्रम प्रवास पर
पूज्य पिता ने उपकार किया था
सैन्यबल सहित राजा का
भरपूर अतिथि सत्कार किया था ../१७/
कामधेनु कपिला के प्रताप से
धनधान्य भरपूर था
आश्रम का वैभव देखकर
राजा का दर्प चकनाचूर था .../१८/
कपिला को हड़प जाने को
सहस्त्रार्जुन ललचाया था
चोरी जैसे नीच कर्म पर
'प्रजापालक' उतर आया था .../१९/
इस बलात हरण का तब मैंने
पुरजोर प्रतिकार किया था
फरसे से हजार भुजाएं काट डाली
लुटेरे का संहार किया था ---/२०/
मेरी अनुपस्थिति में राजपुत्रों ने
ध्यानस्थ पिता की हत्या कर दी
इस कायरतापूर्ण कुकर्म ने मन में
ऐसे क्षत्रियों के प्रति जुगुप्सा भर दी .../२१/
माँ रेणुका सती हो गईं
पल में मैंने माँ- बाप खो दिए थे
इस अपूरणीय क्षति ने
भावी हाहाकार के बीज बो दिए थे ../२२/
मेरे जीवन का एकमेव ध्येय
मातृभूमि का उपचार करना था
फरसे के प्रहार से पापियों का
पापयुक्त दूषित जीवन हरना था.../२३/
इक्कीस बार भू को मैंने
पापीयों से विमुक्त किया था
जगत वन्दनीय धरा को
आततायी रक्त से सिक्त किया था ../२४/
अहा!! कैसा रक्तिम समय वह
कितना प्रचंड दौर था
दसों दिशाओं में त्राहि त्राहि का
खूब मर्मान्तक शोर था .../२५/
पांच सरोवर दूषित रक्त से
मैंने सराबोर किये थे
सहस्त्रार्जुन सुतों के रक्त से
पिता के श्राद्ध घनघोर किये थे .../२६/
अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण कर
अपनी शक्ति का जग को भान दिया
सप्तद्वीप युक्त भूमंडल
फिर महर्षि कश्यप को दान दिया .../२७/
महर्षि ऋचीक प्रकट हुए
उन्होंने मुझे शांत किया था
शस्त्र त्याग कर फिर मैंने
महेंद्र पर्वत पर विश्राम किया था .../२८/
मुझसे शस्त्र विद्या सीखने
कईं विभूतियाँ आती रहीं
भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसी हस्तियाँ
मुझसे ज्ञान पाती रहीं .../२९/
पशु-पक्षियों का और मेरा
आपस में बहुत प्यार था
उनके संग संततियों सा मेरा
प्रेमपूर्ण भावुक व्यवहार था .../३०/
काव्य से प्रेम था मुझे मैं,
शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र का रचनाकार रहा
मेरे द्वारा रचित परशुराम गायत्री
इच्छित फल पाने का अचूक आधार रहा.../३१/
स्त्री स्वातंत्र्य का पक्षधर मैं
मैंने बहु पत्नी विवाह पर आघात किया
अनसूया लोपामुद्रा के सहयोग से
नारी-जागृति-अभियान का सूत्रपात किया .../३२/
आज अक्षय तृतीया है
तुम मेरा जन्मदिन मनाओगे
मेरी जीवन गाथा
तुम सभी को सुनाओगे..../३३/
मेरा आशीष है तुमको
ज्ञानवान बनो विद्यादान करो
सुसुप्त पड़ी हैं शक्तियां
अपनी क्षमता की पहचान करो ..
जय परशुराम
Thursday, May 5, 2016
गुरू
अनहोनी होती नहीं, तू क्यों हुआ उदास ।
होनी भी टल जायेगी, रख गुरु में विश्वास ।।
💐🙏💐
जितने आये कष्ट सब, कर लेना मंजूर।
लेकिन गुरु के द्वार से, कभी न होना दूर ।
💐🙏💐
बिना गुरु के तर सका, हुआ न कोई शूर।
फैल रहा चारों तरफ, मेरे गुरु का नूर ।।
💐🙏💐
गुरु चरणों में शिष्य के, दुःख कट जाते आप ।
पास न उसके आ सके, जग के तीनों ताप ।।
💐🙏💐
अपने गुरु से प्रीत जो, करता है निष्काम।
गुरु चरणों में ही बसे, उसके चारों धाम ।।
💐🙏💐
जितने भी तू कष्ट दे, सब मुझको स्वीकार।
लेकिन गुरु-सेवा विमुख, मत करना कर्तार ।।
💐🙏💐
होनी भी टल जायेगी, रख गुरु में विश्वास ।।
💐🙏💐
जितने आये कष्ट सब, कर लेना मंजूर।
लेकिन गुरु के द्वार से, कभी न होना दूर ।
💐🙏💐
बिना गुरु के तर सका, हुआ न कोई शूर।
फैल रहा चारों तरफ, मेरे गुरु का नूर ।।
💐🙏💐
गुरु चरणों में शिष्य के, दुःख कट जाते आप ।
पास न उसके आ सके, जग के तीनों ताप ।।
💐🙏💐
अपने गुरु से प्रीत जो, करता है निष्काम।
गुरु चरणों में ही बसे, उसके चारों धाम ।।
💐🙏💐
जितने भी तू कष्ट दे, सब मुझको स्वीकार।
लेकिन गुरु-सेवा विमुख, मत करना कर्तार ।।
💐🙏💐
Monday, May 2, 2016
Random
🔹नयी सदी से मिल रही, दर्द भरी सौगात!
बेटा कहता बाप से, तेरी क्या औकात!!
🔹पानी आँखों का मरा, मरी शर्म और लाज!
कहे बहू अब सास से, घर में मेरा राज!!
🔹भाई भी करता नहीं, भाई पर विश्वास!
बहन पराई हो गयी, साली खासमखास!!
🔹मंदिर में पूजा करें, घर में करें कलेश!
बापू तो बोझा लगे, पत्थर लगे गणेश!!
🔹बचे कहाँ अब शेष हैं, दया, धरम, ईमान!
पत्थर के भगवान हैं, पत्थर दिल इंसान!!
🔹पत्थर के भगवान को, लगते छप्पन भोग!
मर जाते फुटपाथ पर, भूखे, प्यासे लोग!!
🔹पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप!
भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप!
( मैं इसका रचयिता नहीं हूँ। किसी और ने मुझे भेजा था।)
बेटा कहता बाप से, तेरी क्या औकात!!
🔹पानी आँखों का मरा, मरी शर्म और लाज!
कहे बहू अब सास से, घर में मेरा राज!!
🔹भाई भी करता नहीं, भाई पर विश्वास!
बहन पराई हो गयी, साली खासमखास!!
🔹मंदिर में पूजा करें, घर में करें कलेश!
बापू तो बोझा लगे, पत्थर लगे गणेश!!
🔹बचे कहाँ अब शेष हैं, दया, धरम, ईमान!
पत्थर के भगवान हैं, पत्थर दिल इंसान!!
🔹पत्थर के भगवान को, लगते छप्पन भोग!
मर जाते फुटपाथ पर, भूखे, प्यासे लोग!!
🔹पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप!
भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप!
( मैं इसका रचयिता नहीं हूँ। किसी और ने मुझे भेजा था।)
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