Sunday, April 10, 2016

आशा और निराशा दोनों का ही भार वहन कर लेना

१)                      
इस जीवन में सुख दुःख दोनों, दोनों को चुप हो सह लेना ।  
मन की बात न कहना जग से, अपने मन से ही कह लेना ॥ 
कितना दुःख है तेरे मन में, अगन जलन  है शीत पवन में । 
जान  न  पाएं  ये  जग  वाले,  नाव  अकेले  ही  खे  लेना ॥ 
(२)
 धरती डोले उमड़े सागर, हिलना मत, हो जाना पत्थर । 
 आँधी अंधड़ तूफानों में, आग  लगे   अरमानों  में  गर ॥ 
 टूट पड़े आकाश मगर तुम, बने हिमालय अटल प्रलय सम । 
 बहने देना दुःख मत करना मन की मन में ही रख लेना ॥ 
(३) 
  जीवन पांच  तत्व का पुतला  यह काया है कच्ची माटी । 
 इस जग का पथ बड़ा कठिन है ये दुनियाँ है दुर्गम घाटी ॥ 
 युग  युग  से  इंसान चला  है, रुका नहीं  गिर पुनः उठा है । 
  गिरने पर अफ़सोस न करना, दोष स्वयं को फिर दे लेना ॥ 
(४)
यह दुनिया संघर्ष भूमि है, कदम कदम पर  समस्या । 
निराकरण के  लिए जरूरी मनसा वाचा कर्म तपस्या ॥ 
तब जीवन की खरी कसौटी हवा गयी फिर कभी न लौटी । 
गया वक्त  फिर हाथ न आता इसीलिए जाने मत देना ॥ 
(५)
 यह मानव  बुलबुला नीर का अवधि काल का  कौन भरोसा । 
क्षण भंगुर है क्षण को कब, कब नहीं पिए बिन पानी कोसा ॥ 
पता  नहीं  है  कौन  ठिकाना, सदा  मृत्यु  का  आना  जाना । 
जीवन  मीत  समान  समझना  नहीं  बैर  इस  उससे  लेना ॥ 
(६)
मोहर  लगी  दानें  दानें  पर, सांस  सांस  पर पहरे दारी । 
सबकी  सामलात  खेती  है, सब की  ही  है  हिस्से दारी ॥ 
 जो बोना बस उसे काटना, उसमें  भी  दो  भाग बांटना । 
लिखा कर्म का कभी न मिटता, जो सिर आये झुक कर लेना ॥ 
(७)
दुःख सुख यश अपयश जो भी हो, पाप पुण्य हो भला बुरा हो । 
जीवन  मृत्यु  धूप  छाया  हो, ताप  शीत  हो प्यार गिला हो ॥ 
सब  समान  कुछ  भेद  न  पाया  सभी  यहां है सधा  सधाया । 
विधना  ने  जो  लिखा  भाग्य में मान  कर्म  फल  सादर लेना ॥ 
(८)
दुःख सुख केवल मन का भ्रम है, भ्रम में काल व्याल सा तम है । 
विपदा  और  सम्पदा  दोनों , कोई  नहीं  किसी  से  कम   हैं ॥ 
मन  के  भीतर  गाँठ  न  देना,  छप्पन  व्यंजन  चना  चबेना । 
आशा  और  निराशा  दोनों  का  ही  भार  वहन   कर  लेना ॥ 

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